बिन सपनो का जीवन

आँख-मिचौली खेलती मुझसे मेरा ही जीवन
निश्चय कर न पाए किस उलझन में है मन
जब कभी ठहराव मिला कदम उठा आगे बढ़ा
एक नए दो-राहे पे ला खड़ा किया ये जीवन

जगमग डगर शहर की अँधेरी गाँव की पगडण्डी
इस रात और दिन के भ्रम में क्यों पिसता जीवन
आगे एक कदम पीछे आधा होता हर क्षण
छोड़ मोह को फिर से उलझता क्यों ये मन

सपनो का एक शहर है प्यारा
न्योछावर है उसपर मेरा तन-मन
ये किस असमंजस में डाले हर बार मुझे तू
जी लूँ कैसे बिन सपनो का जीवन
-चन्दन

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