विजातीय निकाह



तेरे चेहरे की नूर आती है हरपल मेरे ख्वाबों में
कि नकाब हटा दो चेहरे से अब और इंतज़ार नहीं होता
मिलकर एक होनेवाले क्या जाने आह जुदाई का
पढ़ लो मुझे जब इक पल तेरा दीदार नहीं होता
तोड़ दो सारे बंधन आ जाओ मेरी बाँहों में
कि थक चूका हूँ सुनकर विजातीय निकाह नहीं होता
चाँद और सूरज बरक़रार रहे आसमां कि प्रांगन में
लाखों तारे टूट गिरे आसमां को कोई परवाह नहीं होता
दे न दे ज़माना साथ हम मजबूत करेंगे इस बंधन को
इन्सां का भले हो गुनेहगार दीवाना खुदा का नहीं होता
                            Written By:-
                    Chandan Kumar Gupta